Thursday, August 19, 2010

...ताकि कोई सहवाग ना बन जाए !


नियम खेल के लिए बने हैं, न कि खेल नियम के लिए, और जब भी किसी नियम ने खेल को हानि पहुंचाई, तो उस नियम को बदल दिया गया। ठीक ऐसे ही जब क्रिकेट के खेल की शुरुआत हुई, तो इसकी डिक्सनरी में कई नियम थे, लेकिन वक्त और हालात के साथ उनमें से कई नियम इस डिक्सनरी से गायब हो गए। मौजूदा दिनों में क्रिकेट के नो बॉल के नियम ने एक बार फिर इस जेंटलमैन गेम की छवि पर सवाल खड़े कर दिए है, जिसके चलते आईसीसी (अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद) के सामने नो बॉल के नियम में मंथन करने का सवाल खड़ा हो गया है। वैसे क्रिकेट के इतिहास में कई ऐसे वाक्ये दफ्न हैं जो मैदान पर एक बार घटे तो दूसरी बार आईसीसी ने इन्हें दोहराने का मौका नहीं दिया। यानि आईसीसी ने वक्त के साथ कई नियम बदल डाले। क्रिकेट के ऐसे ही कुछ वाक्यों से हम आपको रुबरु कराते हैं, जिनके घटने के बाद इन नियमों को हमेशा के लिए बदल दिया गया।


घटना नंबर-1

दिसंबर 1979 में ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच पर्थ में खेले गए पहले टेस्ट के दौरान घटी। जब दूसरे दिन का खेल शुरू होने पर ऑस्ट्रेलिया के डेनिस लिली ने एल्युमिनियम के बल्ले का इस्तेमाल किया। दिन के शुरु में किसी ने इस पर आपत्ति नहीं जताई, लेकिन जब इस बल्ले से गेंद को नुकसान पहुंचने लगा, तो फिर अंपायरों ने लिली के इस बैट को बदलवा दिया और इस प्रकरण के बाद आईसीसी ने अपने नियमों में लकड़ी के बैट और इसकी लंबाई चौड़ाई का नियम बना दिया गया।

घटना नंबर-2

पहले के तेज गेंदबाज एक ओवर में पूरी छह गेंद बाउंसर फेंका करते थे, क्योंकि उन्हें ऐसा करने की पूरी आजादी थी। 1933 में जब ऑस्ट्रेलिया की टीम इंग्लैंड दौरे पर गई, तो तत्कालिक कप्तान डगलस जोर्डन ने ब्रैडमेन पर अंकुश लगाने के लिए अपने गेंदबाजों को उनके शरीर को निशाना बनाकर गेंदबाजी करने के लिए कहा, जिसके चलते कई बल्लेबाज घायल भी हुए। तब आईसीसी ने गेंदबाजों के खतरनाक तेवरों को देखते हुए एक ओवर में एक बाउंसर का नियम बना दिया।

घटना नंबर-3

ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच 1981 को मेलबर्न में खेले गए वनडे मैच के दौरान ग्रेग चैपल ने अपने छोटे भाई ट्रेवर चैपल को अंडर आर्म गेंद फेंकने की सलाह दी, ताकि न्यूजीलैंड का कोई बल्लेबाज छक्का लगाकर मैच ना जीता दे। और उन्होंने ऐसी ही एक गेंद फेंककर टीम को जीत दिला दी। नियमों के हिसाब से ये गेंद पूरी तरह सही थी, क्योंकि आईसीसी के नियमों में अंडर आर्म गेंद फेंकने का कोई नियम नहीं था। लेकिन इस घटना को खेल भावना के लिए सही नहीं माना गया। इस घटना के बाद आईसीसी ने अपने नियमों से अंडरआर्म गेंदबाजी पर प्रतिबंध लगा दिया।

यानि क्रिकेट के इतिहास में ऐसे कई वाक्ये घटे हैं जिनकी आलोचना के बाद आईसीसी ने अपने नियमों को बदला है। ऐसे में मौजूदा नो बॉल प्रकरण ने एक बार फिर आईसीसी को अपने नियम बदलने की तरफ इशारा कर दिया है। दरअसल ट्राई सीरीज में भारत-श्रीलंका के मैच में भारत की मैच जीतने और वीरेंद्र सहवाग को शतक पूरा करने के लिए एक रन की जरुरत थी। लेकिन लंकाई ऑफ स्पिनर सूरज रंदीव ने जानबूझकर नो बॉल फेंकी जिस पर सहवाग ने छक्का लगा दिया। क्योंकि नो बॉल का रन टीम के खाते में पहले जोड़ा जाता है, इसलिए सहवाग अपना शतक पूरा ना कर सके। ऐसे में सवाल ये खड़ा हो गया है कि अगर टीम को जीत के लिए दो रनों की जरुरत होती तो फिर टीम के खाते में सात और सहवाग के खाते मे छह रन जुड़ जाते। आईसीसी को अपने इस नियम पर जल्द ही कोई अनुचित कदम उठाना चाहिए ताकि भविष्य में कोई और खिलाड़ी सहवाग की तरह अपने शतक से महरुम ना रह जाए।

Tuesday, July 13, 2010

मंहगाई डायन खाय जात है!



सखी सैंया तो खूब ही कमात है,मंहगाई डायन खाय जात है, पीपली लाइव फिल्म के इस गाने ने जमकर धूम मचा दी है। शायद इसलिए कि गाना ही कुछ ऐसा है, शायद इसलिए रघुवीर यादव की अदाकारी लजबाब है, या फिर शायद इसलिए कि गाने के बोल हकीकत को बयां करते हैं, वजह इन तीनों में से कोई भी हो लेकिन सुनकर मजा आ जाता है। लेकिन क्या ये गाना सिर्फ मजे के लिए बनाया या गाया गया है, ये सबसे बड़ा सवाल है? पीपली लाइव की कहानी क्या है, इसका पता तो फिल्म के रिलीज होने के बाद ही चलेगा, लेकिन आमिर खान इस फिल्म में बढ़ती मंहगाई पर प्रहार किया है, ये गाने के बोल साफ बयां करते हैं। गरीब आदमी पर मंहगाई क्या सितम ढा सकती है, ये फिल्म के प्रोमों को देखकर पता चलता है। क्योंकि फिल्म की पब्लिसिटी खूब जोर-शोर से हो रही है, ऊपर से ये फिल्म आमिर के प्रोडक्शन की है, यानि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर चलना लगभग तय माना जा रहा है। ये बात भी तय है कि गरीबी पर फिल्माई इस फिल्म को, पैसे वाले लोग किसी मल्टीप्लेक्स में पॉप कॉर्न और कोलड्रिंग के स्वाद के साथ खूब ठहाके लगाकर देखने वाले हैं। लेकिन फिल्म के रिलीज होने के बाद दर्शकों के सामने जो सबसे बड़ा सवाल होगा, वो ये है कि ये फिल्म सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि गरीब आदमी की वो कहानी है जिसे मंहगाई के चलते आय दिन आत्महत्या करनी पड़ती है। और मीडिया उसकी मौत को हॉट स्टोरी बनाकर पूरे दिन खेलता रहता है। कसूर शायद मीडिया का भी नहीं है, क्योंकि उसको बाकी चैनलों के साथ दौड़ना है। लेकिन उस मौत का जिम्मदार कौन होता है? आखिर क्यों किसी गरीब को ऐसा कदम उठान पड़ता है? इन सवालों के लिए सरकार या उसकी मौत से जुड़े मुद्दे को कटघरे में खड़ा करे तो शायद इन गरीबों की या मंहगाई की समस्या का निदान हो सके। लेकिन इस मंहगाई की समस्या से तभी निपटा जा सकता है जब हर आदमी कदम से कदम मिलाकर चले। क्योंकि बढ़ती मंहगाई के लिए सिर्फ सरकार को दोष देना ठीक नहीं है, और ना ही उसका पक्ष लेना। मैं तो लोगों से सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि फिल्म कोई भी हो कैसी भी हो लोगों के मनोरंजन के लिए ही बनती है, लेकिन उस फिल्म को देखने वाले दर्शक मनोरंजन की दुनिया से बाहर आकर ज़रा सा उसके बारे में सोचेंगे, तो शायद विकल्पों के कई रास्ते खुल जाएं।

Saturday, July 10, 2010

हम जुदा हो गए..


प्यार के वो वादे,

परिवार की खुशी के आगे,

मानो किसी जुर्म की सज़ा हो गए,

उन सब के चेहरे पर तो खुशी आ गई,

लेकिन, हम जुदा हो गए...


सिर्फ उनका प्यार पाने के लिए,

ईश्वर पर जो श्रृद्धा जताई थी,

एक बार तो हमारी भक्ति भी रंग लाई थी,

लेकिन अब, शायद वो भी हमसे ख़फ़ा हो गए,

और, हम जुदा हो गए...


शुरुआत में जहां हर मंजिल थी आसां,

दुनिया के कदमों से दूर, हर कदम थे हम पर मेहरबां,

आज उन्हीं की आहट से, सारे रास्ते फ़ना हो गए,

दुनिया की नज़र ऐसी लगी, कि सब हमसे बेवफ़ा हो गए,

और, हम जुदा हो गए...

Thursday, July 8, 2010

बर्बाद या चमत्कार


उसके घर जाने के साथ,

घरवालों को कुछ बताने के साथ,

हमारी प्रेम कहानी लाएगी इक नया रंग,

प्रभु ने चाहा, तो मेरा प्यार होगा मेरे संग,

नहीं तो टूट जाएगा, दिल का ये दर्पण,

और, मैं हो जाऊंगा अपंग।


अब उनसे की गई भक्ति का,

चमत्कार देखने का वक्त आ गया है,

क्योंकि प्रेम कहानी पर हमारी,

एक काला बादल छा गया है,

ये बादल अब छटेंगे या नहीं,

ये तो मेरा दिल नहीं जानता,

क्योंकि पागल है ये दिल,

अपने आगे किसी की नहीं मानता।


अब मुझे, मेरे दिल और मेरे प्यार को,

सिर्फ और सिर्फ इक चीज का है इंतजार,

कि कब करेंगे ईश्वर, अल्लाह और परमेश्वर,

हम दोनों और हमारी भक्ति पर चमत्कार।

जैसे कल की ही बात है


आंखो की नमी अभी सूखी भी नहीं,

यादों का आंचल अभी थमा भी नहीं,

कि इस दिल को याद वो आने लगे,

अब आंखों में मेरी, उन पलों की याद है,

मानो जैसे कल की ही बात है।


साया जो मेरा, सदा से मेरे साथ है,

अब साथ वो भी छोड़ने लगा है, क्योंकि...

अतीत का साया मेरे असतित्व को घेरने लगा है,

लेकिन, साया तो मेरे साथ है,

मानो जैसे कल की ही बात है।


अब जी रहा हूं तो इस शर्त पर,

कि जान दे नहीं सकता, वादा जो किया था उस जान से,

लेकिन, जिंदा रह नहीं सकता, यादों के उस तूफान से,

क्योंकि, वो ख्वाबों में अब भी मेरे साथ है,

मानो जैसे कल की ही बात है।

अतीत की काली परछाई


गुज़रे हुए कल के, तूफां के झोंको की वो चुभन

दिल में असिमित दर्द का, अहसास दिला सी जाती है।

दिल के ना चाहने पर भी, अतीत की वो काली परछाई

कल के भविष्य को, थोड़ा सा झुलसा सी जाती है।

मैं हर मोड़ पर जीत का, नया फ़साना लिखना चाहता हूं

ये आकर उसे कालिक से, थोड़ा सा मिटा सी जाती है।

हार की ना सोचकर चलने वाले मुझ को

ये अपना कड़वा स्वाद चखा ही जाती है।

मैं जहां शीत लहर का ठंडा स्पर्श पाना चाहता हूं

ये आकर रेगिस्तां की गर्म लू का अहसास करा सी जाती है।

दिल के अरमानों का फूल खिलने से पहले

उस पर पतझड़ का कहर बरपा सी जाती है।

मेरे स्वस्थय तन से लगकर, मुझे अपंग बना सी जाती है।

दिल के ना चाहने पर भी, अतीत की काली परछाई

बार-बार क्यूं आती, बार-बार क्यूं आती है।

जब प्यार किसी से होता है...

कल जहां प्यार की समझ नहीं थी हमको

दोस्ती भी क्या है इसकी उपज नहीं थी हमको

इन दोनों की गहराई का रिश्ता पढ़ नहीं पाते थे

बातें, खेल, पढ़ाई के लिए हम सबको मित्र बनाते थे

पर साथ में जो धीरे-धीरे, यूं मिलकर हम बड़े हुए

बातें, खेल, पढ़ाई के साथ, दोस्ती की अहमियत भी समझने लगे

न जाने क्यूं ये मन, बस फिर आपमें ही खोया रहता

हर पल हमारी आंखों में, आपका सुंदर सा मुखड़ा रहता

शायद उस वक्त हम दोस्ती से कुछ ऊपर सोचने लगे

क्योंकि मन ही मन हम आपको पसंद जो करने लगे

फिर तो रोजाना आप-ही-आप इस दिल में बसने लगे

और बदन तो हमारा रहा, पर इसमें महकने आप लगे

फिर दिल ने चाहा बतादें, हम आपसे कितनी मोहब्बत करने लगे

कि आपको देखें तो जीने, ना देखें तो मरने लगे

आपको बताया जब हमने, जिस तरह दुनिया में

सूरज का किरण से, आग का अगन से

हवा का गगन से और फूलों का चमन से

कुछ ऐसा ही हम आपसे ये रिश्ता जोड़ना चाहते हैं

मोहब्बत है इतनी आपसे, कि दो बदन एक जान होना चाहते हैं

खुश किस्मत थी तक़दीर हमारी, जिसे आप पढ़ने लगे

हमारे प्यार की चुनर ओढ़ कर, आप इसमें संवरने लगे

आज जीवन का हर रिश्ता, यूं जुड़ा है तुमसे ऐसे

जो टूटेगा ये रिश्ता, तो मर जाएंगे हम जैसे

शाहजहां ने मुमताज को दिया,

प्यार का नज़राना, ताजमहल के रूप में

हम आपको दे रहें है,

दिल से निकला ये अफसाना, इस कविता के रूप में

प्यार और सच्चाई के अक्षरों से लिखी

इस कविता को तुम गलत मत समझना

हम पर शक़ करके, हमें आजमने की कोशिश न करना

बस इतना कहे देते हैं हम आपसे

आपको पाने की हसरत में सब कुछ है कर गुजरना।