
कल जहां प्यार की समझ नहीं थी हमको
दोस्ती भी क्या है इसकी उपज नहीं थी हमको
इन दोनों की गहराई का रिश्ता पढ़ नहीं पाते थे
बातें, खेल, पढ़ाई के लिए हम सबको मित्र बनाते थे
पर साथ में जो धीरे-धीरे, यूं मिलकर हम बड़े हुए
बातें, खेल, पढ़ाई के साथ, दोस्ती की अहमियत भी समझने लगे
न जाने क्यूं ये मन, बस फिर आपमें ही खोया रहता
हर पल हमारी आंखों में, आपका सुंदर सा मुखड़ा रहता
शायद उस वक्त हम दोस्ती से कुछ ऊपर सोचने लगे
क्योंकि मन ही मन हम आपको पसंद जो करने लगे
फिर तो रोजाना आप-ही-आप इस दिल में बसने लगे
और बदन तो हमारा रहा, पर इसमें महकने आप लगे
फिर दिल ने चाहा बतादें, हम आपसे कितनी मोहब्बत करने लगे
कि आपको देखें तो जीने, ना देखें तो मरने लगे
आपको बताया जब हमने, जिस तरह दुनिया में
सूरज का किरण से, आग का अगन से
हवा का गगन से और फूलों का चमन से
कुछ ऐसा ही हम आपसे ये रिश्ता जोड़ना चाहते हैं
मोहब्बत है इतनी आपसे, कि दो बदन एक जान होना चाहते हैं
खुश किस्मत थी तक़दीर हमारी, जिसे आप पढ़ने लगे
हमारे प्यार की चुनर ओढ़ कर, आप इसमें संवरने लगे
आज जीवन का हर रिश्ता, यूं जुड़ा है तुमसे ऐसे
जो टूटेगा ये रिश्ता, तो मर जाएंगे हम जैसे
शाहजहां ने मुमताज को दिया,
प्यार का नज़राना, ताजमहल के रूप में
हम आपको दे रहें है,
दिल से निकला ये अफसाना, इस कविता के रूप में
प्यार और सच्चाई के अक्षरों से लिखी
इस कविता को तुम गलत मत समझना
हम पर शक़ करके, हमें आजमने की कोशिश न करना
बस इतना कहे देते हैं हम आपसे
आपको पाने की हसरत में सब कुछ है कर गुजरना।
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