Thursday, July 8, 2010

अतीत की काली परछाई


गुज़रे हुए कल के, तूफां के झोंको की वो चुभन

दिल में असिमित दर्द का, अहसास दिला सी जाती है।

दिल के ना चाहने पर भी, अतीत की वो काली परछाई

कल के भविष्य को, थोड़ा सा झुलसा सी जाती है।

मैं हर मोड़ पर जीत का, नया फ़साना लिखना चाहता हूं

ये आकर उसे कालिक से, थोड़ा सा मिटा सी जाती है।

हार की ना सोचकर चलने वाले मुझ को

ये अपना कड़वा स्वाद चखा ही जाती है।

मैं जहां शीत लहर का ठंडा स्पर्श पाना चाहता हूं

ये आकर रेगिस्तां की गर्म लू का अहसास करा सी जाती है।

दिल के अरमानों का फूल खिलने से पहले

उस पर पतझड़ का कहर बरपा सी जाती है।

मेरे स्वस्थय तन से लगकर, मुझे अपंग बना सी जाती है।

दिल के ना चाहने पर भी, अतीत की काली परछाई

बार-बार क्यूं आती, बार-बार क्यूं आती है।

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