
सखी सैंया तो खूब ही कमात है,मंहगाई डायन खाय जात है, पीपली लाइव फिल्म के इस गाने ने जमकर धूम मचा दी है। शायद इसलिए कि गाना ही कुछ ऐसा है, शायद इसलिए रघुवीर यादव की अदाकारी लजबाब है, या फिर शायद इसलिए कि गाने के बोल हकीकत को बयां करते हैं, वजह इन तीनों में से कोई भी हो लेकिन सुनकर मजा आ जाता है। लेकिन क्या ये गाना सिर्फ मजे के लिए बनाया या गाया गया है, ये सबसे बड़ा सवाल है? पीपली लाइव की कहानी क्या है, इसका पता तो फिल्म के रिलीज होने के बाद ही चलेगा, लेकिन आमिर खान इस फिल्म में बढ़ती मंहगाई पर प्रहार किया है, ये गाने के बोल साफ बयां करते हैं। गरीब आदमी पर मंहगाई क्या सितम ढा सकती है, ये फिल्म के प्रोमों को देखकर पता चलता है। क्योंकि फिल्म की पब्लिसिटी खूब जोर-शोर से हो रही है, ऊपर से ये फिल्म आमिर के प्रोडक्शन की है, यानि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर चलना लगभग तय माना जा रहा है। ये बात भी तय है कि गरीबी पर फिल्माई इस फिल्म को, पैसे वाले लोग किसी मल्टीप्लेक्स में पॉप कॉर्न और कोलड्रिंग के स्वाद के साथ खूब ठहाके लगाकर देखने वाले हैं। लेकिन फिल्म के रिलीज होने के बाद दर्शकों के सामने जो सबसे बड़ा सवाल होगा, वो ये है कि ये फिल्म सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि गरीब आदमी की वो कहानी है जिसे मंहगाई के चलते आय दिन आत्महत्या करनी पड़ती है। और मीडिया उसकी मौत को हॉट स्टोरी बनाकर पूरे दिन खेलता रहता है। कसूर शायद मीडिया का भी नहीं है, क्योंकि उसको बाकी चैनलों के साथ दौड़ना है। लेकिन उस मौत का जिम्मदार कौन होता है? आखिर क्यों किसी गरीब को ऐसा कदम उठान पड़ता है? इन सवालों के लिए सरकार या उसकी मौत से जुड़े मुद्दे को कटघरे में खड़ा करे तो शायद इन गरीबों की या मंहगाई की समस्या का निदान हो सके। लेकिन इस मंहगाई की समस्या से तभी निपटा जा सकता है जब हर आदमी कदम से कदम मिलाकर चले। क्योंकि बढ़ती मंहगाई के लिए सिर्फ सरकार को दोष देना ठीक नहीं है, और ना ही उसका पक्ष लेना। मैं तो लोगों से सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि फिल्म कोई भी हो कैसी भी हो लोगों के मनोरंजन के लिए ही बनती है, लेकिन उस फिल्म को देखने वाले दर्शक मनोरंजन की दुनिया से बाहर आकर ज़रा सा उसके बारे में सोचेंगे, तो शायद विकल्पों के कई रास्ते खुल जाएं।
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