Saturday, July 10, 2010

हम जुदा हो गए..


प्यार के वो वादे,

परिवार की खुशी के आगे,

मानो किसी जुर्म की सज़ा हो गए,

उन सब के चेहरे पर तो खुशी आ गई,

लेकिन, हम जुदा हो गए...


सिर्फ उनका प्यार पाने के लिए,

ईश्वर पर जो श्रृद्धा जताई थी,

एक बार तो हमारी भक्ति भी रंग लाई थी,

लेकिन अब, शायद वो भी हमसे ख़फ़ा हो गए,

और, हम जुदा हो गए...


शुरुआत में जहां हर मंजिल थी आसां,

दुनिया के कदमों से दूर, हर कदम थे हम पर मेहरबां,

आज उन्हीं की आहट से, सारे रास्ते फ़ना हो गए,

दुनिया की नज़र ऐसी लगी, कि सब हमसे बेवफ़ा हो गए,

और, हम जुदा हो गए...

2 comments:

  1. वाह...वाह क्या बात है
    अच्छी कविता नरेन्द्र
    लगे रहो सफलता जरूर मिलेगी

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  2. वाह नरेन्द्र बाबू आप कविताकार भी हैं हमने ये नही सोचा था...आपकी टर्फ दिखती पिच पर कविता रुपी बॉलिंग होती है...ये जानकर अच्छा लगा....लगे रहो....

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