(यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है, इसका किसी पात्र या घटना से कोई संबंध नहीं है, इससे वाबजूद ये कहानी किसी से मिलती है तो ये सिर्फ एक संयोग होगा।)
दाई के दौड़ते कदमों की आहट जैसे-जैसे डाइनिंग रूम की तरफ बढ़ रही थी, कौशल कुमार के दिल की धड़कन भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही थी, हांफती-हांफती दाई कौशल के पास पहुंची, उसकी सांस उखड़ी हुई थी, दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था मानों तबले पर कोई थाप दे रहा हो, अपने उसी हांफते स्वर में उसने कौशल कुमार से कहा- बधाई हो बधाई हो, लड़का हुआ है। उसके दो शब्द जैसे ही श्री राम भवन में गूंजे कौशल का मायूस चेहरे पर खुशी की चमक दौड़ गई। उसने जेब में हाथ डालकर पैसे निकाले और निसंकोच भाव से सारे के सारे दाई के दामन में डाल दिए। शहर के जाने-माने हुए बिल्डर कौशल कुमार के लिए मौका ही कुछ ऐसा था, कि अगर आज वो पैसों का हिसाब करते तो शायद उनके लिए बेमानी होती। दाई को पैसे देकर कौशल ने अपनी पत्नी विमला के रूम की तरफ इस तरह दौड़ लगाई जैसे उन्होंने ओलंपिक में हिस्सा लिया हो। कमरे में पहुंचते ही उन्होंने अपने बेटे को गोद में उठाकर उसका माथा चूम लिया। बेटे का दमकता चेहरा और चमकती आंखों को देखकर उन्होंने उसी वक्त उसका नाम अमन कुमार रख दिया। कौशल कुमार इलाहबाद में एक जाने-माने बिल्डर थे, शहर के बीचों-बीच उनका शानदार बंगला बना हुआ था, जिसका नाम श्री राम भवन था। अनुसूचित जाति के होने के बाद भी शहर के लोग उनका काफी सम्मान करते थे, वैसे भी जिस शहर में त्रिवेणी संगम होता हो वहां के लोगों के लिए जात-पात कोई मायने नहीं रखती। समय का पहिया अपनी चाल चलता रहा और कौशल का बेटा अमन पांच साल का हो गया। कौशल कुमार ने अमन को उच्छी तालिम सीखाने के लिए बोर्डिंग स्कूल भेज दिया। अमन ना सिर्फ पढ़ाई में बल्कि खेलकूद में भी दूसरे बच्चों से बेहतर था, उसकी इसी खूबी की वजह से उसके दोस्तों की लिस्ट हमेशा लंबी रहती थी। वक्त का पहिया अपनी चाल से घूम रहा था और देखते ही देखते अमन कुमार ने अपनी 12वीं की पढ़ाई पूरी कर ली। इसके बाद वो अपने घर इलाहबाद वापस आ गया। पिता ने आगे की पढ़ाई के लिए पूछा तो अमन ने कंप्यूटर में इंजीनियरिंग करने को कहा। पिता ने अमन को हरी झंडी दे दी और एक बार फिर उसे बीई करने के लिए अपने से दूर भेज दिया। अमन के बचपन की कहानी खत्म हो चुकी थी, अब तक उसके जो दोस्त बने वो सिर्फ अमन को जानते थे, उन्होंने अमन कुमार को जानने की कोई कोशिश नहीं की, लेकिन अब वक्त बदल चुका था। अमन ने शायद कभी नहीं सोचा की कॉलेज का पहला ही दिन उसकी जिंदगी में हलचल मचा देगा। कॉलेज के पहले दिन सभी छात्र एक-दूसरे को अपना परिचय दे रहे थे। कोई शर्मा, कोई त्रिवेदी, कोई राजपूत, कोई भदौरिया, कोई खान, कोई रिषीश्वर और आखिर में अमन कुमार। अमन का नाम सुनते ही कुछ लोगों ने उससे एक सवाल किया, ये कुमार कौन होते हैं ? अमन के लिए पहला मौका था जब उसे इस तरह के सवाल का सामना करना पड़ा। लेकिन उसने बड़ी ही सहज भाव से कहा, कि मैं अनुसूचित जाति में आता हूं। उसकी इस बात को सुनकर कई लोगों ने उससे मुंह मोड़ लिया, लेकिन उन्हीं में से एक शख्स ने उसका हाथ थामते हुए कहा, हम सभी यहां बीई के स्टूडेंट हैं, ना कि ब्राम्हण, ठाकुर...या कुछ और। इसी मौके पर क्लास में सर की एंट्री हो जाती है और बात शायद वहीं खत्म हो जाती। कॉलेज खत्म होने पर अमन अपने रूम में आ गया और फिर उस वाक्ये के बारे में सोचने लगा। वो सोचने लगा कि जात-पात क्या होती है ? क्या ये इंसान से बड़ी होती है ? आखिर क्यों, क्लास के लोगों ने उससे उसकी जात के बारे में पूंछा, और मेरे बारे में जानकर मुझसे मुंह क्यों मोड़ लिया ? सवालों के लहरें उसके दिमाग में हिलोरे मार रही थीं, तभी अचानक उसके दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। अमन ने दरवाजा खोला तो उसके सामने रिषीश्वर खड़ा था, वो रिषीश्वर जिसने क्लास में उसका हाथ थामा था। अमन ने उसे अंदर आने को कहा, और फिर दोनों के बीच में बात-चीत शुरू हुई। उसका पूरा नाम बृजेंद्र रिषीश्वर था, जो ग्वालियर का रहना वाला था, उसके पिता डॉक्टर थे और उसने ग्वालियर से ही 12वीं तक की पढ़ाई की थी। बातों ही बातों में दोनों के बीच दोस्ती गहराती गई। वो अमन के बारे में जान चुका था कि वो एक एससी (अनुसूचित जाति) का लड़का है, लेकिन अमन ने बृजेंद्र से उसकी कास्ट के बारे में नहीं पूछा, फिर भी बृजेंद्र ने बताया कि रिषीश्वर ब्राम्हण होते है, साथ ही उसने कहा कि उसके लिए जात-पात कोई मायने नहीं रखती। एक बार फिर समय चक्र अपनी रफ्तार से घूमता रहा, और आखिर में वो दिन आया जब उनकी बीई की पढ़ाई पूरी हो गई। अमन का टॉपर लिस्ट में दूसरा स्थान था वहीं बृजेंद्र रिषीश्वर लिस्ट में पहले स्थान पर था। कॉलेज में चार साल की पढ़ाई के दौरान अमन ने कई बार दोस्तों की नजर में अपने लिए सिर्फ घृणा देखी, सिर्फ इसलिए कि वो एक ऐसे घर में पैदा हुआ था जो कि अनुसूचित जाति का था। लेकिन अमन की आंखों में इस वक्त अजीब सी चमक थी, क्योंकि कॉलेज में उसका सबसे अज़ीज दोस्त अव्वल आया था, वो दोस्त जिसने चार सालों के दौरान अमन का हाथ कभी नहीं छोड़ा। अमन का साथ देने पर क्लास में बृजेंद्र के उसी के जात वाले दुश्मन बन चुके थे। लेकिन कहते हैं कि अगर आलादीन का चिराग हाथ में हो, तो दुनिया को भी जीता जा सकता है, और वो चिराग इस वक्त उनके हाथों में उनकी मार्कशीट के रूप में था। क्लास के वो सभी लड़के जो कभी टेड़ी नजर से भी अमन को नहीं देखते थे, उससे हाथ मिलाकर गले लगकर बधाईयां दे रहे थे। बीई की डीग्री अमन के हाथों में थी लेकिन वो आज जीवन का इम्तिहान पास कर चुका था। वो जान चुका था कि इलाहबाद में उसके पिता की इज्जत लोग सिर्फ इसलिए करते हैं, क्योंकि उनके पास पैसा और पावर है। क्योंकि उसी शहर में कई अनुसूचित जाति वाले ऐसे भी हैं, जिनसे हाथ मिलाने से भी लोग घबराते हैं। वो जान चुका था कि आज उसके दुश्मन दोस्त सिर्फ उसे इसलिए गले लगाकर बधाई दे रहे हैं, कि कल शायद मैं उनके काम आ जाऊं। ये सारी बातें शायद बृजेंद्र भी महसूस कर रहा था, तभी तो दोनों एक-दूसरे को देखकर सिर्फ मुस्कुराए जा रहे थे।
Good jobs
ReplyDelete